العدد التاسع والعشرون - كانون الاول

أمي

أسعد ذبيان
السبت 12 كانون الثاني (يناير) 2008.
 

أمّي.. اعذريني إن قصّرت..

أمّي.. سامحيني.. أعلمُ إنّي فعلت!

أمّي..وعدتُكِ ألا أبكي..

فسامحيني إن بكيت!

أمّي.. طاهرةٌ أنتِ بين النساء..

أمّي.. صابرةٌ أنتِ، تحمّلتِ العناء

أمّي.. انظري، ها قد أتى الجميعُ إليكِ..

أمّي.. انظريهم.. افتحي عينيكِ..

أمّي.. هؤلاء القوم الذين عاشرت..

فانظري واحكمي.. هل حسناً فعلت؟!

أمّي.. من سيغطيني عندما أنام؟!

من يقبّل الجفنَ بعدكِ؟! من ينادي الأحلام؟!

من سيسألني كلّ يومٍ ماذا صنعت؟!

من سيُسامِرَني إن في بهو المنزلِ جلًسِت؟!

أمّي.. من سيدعو لي في الصباح؟!

أمّي.. من سيسعد لي عند النجاح؟!

أمّي.. من سيقاسمني الأفراح؟

من الذي سيهوّن عليّ المصائب، وينسيني الأتراح؟!

أمّي.. اعذريني إن كنتُ شقياً وتطاولت..

فغير رضاكِ أبداً ما طلبت..

أمّي. سامحيني إن تلهّيتُ عنكِ أبداً..

لم أعرف أنّي لن أجدَ غيركِ سنداً..

أمّي.. أينَ أذهبُ برائحتكِ في طيّاتي؟!

أين أذهب بذكراكِ في حياتي؟!

أمّي.. اعذريني إن لم أفسّحكِ وأروّحً عنكِ عندما كنتِ بين يديّ

اطلبي ما شئتِ.. خذي عينيّ..

أمّي.. سامحيني إن عشت في ظروفٍ عصيبة!

اغفري لي لأنّي جعلتُكِ تشاركيني المصيبة!

أمّي.. أنتِ قديسةٌ وأنت ملاكي..

أمّي.. لا أطلبُ شيئاً غير رضاكِ..

أمّي.. كيف أخرجُ بوجهي أمام البشر؟!

وقد وضعوا جسدكِ في الحجر؟!

* * * * *

أمّي.. كيف أصحو؟ وكيف أرقُد؟

كيف أصبر؟ وكيف أصمُد؟

أمّي.. إلى اين تتركيني وترحلين؟

إلى من تتركين أختيَ وتذهبين؟!

أمّي.. سامحي أمّتي لأنّها لم تُنصِفكِ

سامحي الدّنيا.. لأنّها لم تعرِفكِ..

أمّي.. اغفري لمن تخلّى عن طُهرِ نعلكِ..

اشفعي لمن لا يعلمُ جميلَ فِعلكِ..

* * * * *

أمّي.. شكراً لكِ.. لأنّكِ زرعتِ في المحبّة..

لأنّكِ زرعتِ الله والربّ!

أمّي.. شكراَ.. لأنّكِ ربيتني على الحلال!

أن أبقى سلطاناً بذاتي.. من دون المال..

شكراً.. لأنّكِ. اخترتِ حياة الشقاء والقناعة..

لأنّكِ سقيتني الأمانة منذ الرضاعة..

أمّي.. خائفٌ أنا.. فإلى صدركِ الحنون ضمّيني..

أمّي.. مقصّرٌ أنا.. فبعطفكِ ارحميني!..

أسعد ذبيان