العدد الثاني والثلاثون - نيسان

أنــت ِ أمي

زينب عبد الله
الخميس 24 نيسان (أبريل) 2008.
 

 

أنت ِ أمي.. أنت ِ الحبيبة..

أنت ِ العطف.. أنت ِ الرأفة..

أنت ِ اللؤلؤ والمرجان.

 

أنت ِ أمي.. أنت ِ المرأة..

أنت ِ الأسطر.. أنت ِ الأحرف والثقوب..

أنت ِ الجبال.. أنت ِ الحقول..

التي ينبت منها قلبي..

أنت ِ اللـّهب في البراكين..

والصقيع في الجليد..

 

أنت ِ أمي.. أنتِ الأنوثة..

أنت ِ إندفاعي.. وذراعي..

أنت ِ جبيني.. وخلجان قلبي..

أنت ِ سِرُّ إيماني..

فحضنك يساوي عندي..

فصاحة العرب..وبداهة الإنجليز.

 

أحن ُّ إلى يديك ِ..

اللتان تطعمانني الحُبَّ والحنانَ

 

أحن ُّ إلى صدرك..ِ

الذي أنام عليه دهر الأزمان.

 

أحن ُّ إلى إستعطافك ِ..

الذي يجلبني من سعير الظلام.

 

أقول لك ِ كلمة..

كلمة ُدفنت مهدا.

فأمست في الغليل..سرَّ الأكوان

فجل َّ ما أقوله..

شكرا

شكرًا على التضحية والعطاء..

شكرًا على المحبة والوفاء..

شكرًا على التلقين والإصلاح.

 

هل أحبكِ؟..

نعم..

 أحبك ِ قبل الله.. وبعد الله.

فأنت ِ..

 ببساطة القلب..وبطبيعة الصفاء.

 

أنت ِ..

النور في ظلمتي..

 والبهجة في يأسي.

انت..

ِ الحكمة في جنوني..

 والعقل في وجداني.

 

أنا..

 دونك ِ..

 نسر ٌ بلا أجنحة.

 

أنا..

 دونك ِ..

 أحجية بلا مفتاح.

 

أنا..

 دونك..

بِركان ٌ ثائر ُ الأقطاب.

 

لن أقصَّك بحكايا شهرزاد..

وروايات أحلام..

فتعبت من النحت فوق الرمال..

لأنك داخلي..

بحرٌ يثور..

جمرٌ يحوم..

فصرت أقوى من أي يوم..

..أشرس من أي عاقل..

..أعنف من أيِّ سياسي..

 

ماذا فعلت ِ بي؟..

علمتيني الرقة..

 لأناصر الحق.

منحتيني القوة..

 لأشعل فضائي..

لقنتيني السحر..

 لأفتن روحي.

 

ماذا أقول بعد؟..

ماذا أفعل أكثر؟..

ألم يكفيك ِ المستحيل..

 تحت قدميك ِ؟

 ألم تحوطك  بسالتي..

 حول جسدك ِ؟

فأنت ِ..

أمي وأمي وأمي..